Sunday, 12 February 2017

क्या सच में लड़के का जॉब देख कर लड़कियां करती हैं लड़के को पसंद ?


लड़के-लड़कियों के बीच पारस्परिक आकर्षण होना आम बात है, उनका एक- दूसरे को पसंद करना, एक-दूसरे को इम्प्रेस करने की कोशिश करना बहुत स्वाभाविक है। लड़कों की पसंद के बारे में कहा जाता है कि गर्लफ्रेंड के रूप में भले ही उन्हें मॉडर्न लड़कियां पसंद आती हैं लेकिन जब बात शादी की होती है तो उन्हें ऐसी लड़कियां ही पसंद आती हैं जो उनका और उनके परिवार की देखभाल कर सकें। वहीं अगर जॉब या वर्क प्रोफाइल की बात करें तो यूं तो लड़के मॉडलिंग करने वाली लड़कियां, एयर हॉस्टेस और ग्लैमर वर्ल्ड से जुड़ी लड़कियों के प्रति आकर्षित होते हैं, लेकिन अगर उन्हें शादी करनी हो तो वे ऐसी लड़की का चुनाव करते हैं जो या तो हाउसवाइफ बनने के लिए तैयार हो या फिर ऐसी जॉब करती हो जिससे कि वह घर को भी टाइम दे सके। लेकिन लड़कियों की च्वॉइस का क्या? हम आपको बताते हैं कि लड़कियों को कैसे और किस तरहे के प्रोफेशन से जुड़े लड़के पसंद आते हैं।
1. लड़कियों को इंजीनियर्स भी पसंद आते हैं। उनके पास जॉब भी अच्छी होती हैं और वे बहुत कूल भी माने जाते हैं।
2. लड़कियों को वे लड़के बहुत आकर्षित करते हैं जो लेखन के क्षेत्र से जुड़े होते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसे लड़के बहुत संवेदनशील होते हैं और भावनाओं को समझ सकते हैं।
3. लड़कियों को अपनी तस्वीर खिंचवाना बहुत पसंद होता है इसलिए उन्हें लड़के भी ऐसे पसंद आते हैं जो अच्छी तस्वीरें खींच सकते हों, इसीलिए उनकी लिस्ट में फोटोग्राफर्स का भी नाम है।
4. अगर हस्बैंड अच्छा खाना बना ले तो इससे ज्यादा कोई क्या मांग सकता है। कौन पूरा दिन रसोई में खाना बनाते हुए गुजारना चाहता है, इसलिए उन्हें शेफ पसंद आते हैं ताकि बैठे-बिठाए उन्हें अच्छा खाना मिलता रहे।
5. यूनिफॉर्म में लड़के वैसे भी स्मार्ट लगते हैं। इस क्रम में सेना के जवान लड़कियों की लिस्ट में टॉप पर हैं।
6. यूनिफॉर्म के साथ-साथ पायलट्स में गजब का आकर्षण और दुनिया घूमने की ललक होती है। वे वेल ग्रूम्ड होते हैं, अच्छा कमाते हैं, पढ़े-लिखे होते हैं, ये सब लड़कियों को बहुत रिझाता है।
7. डॉक्टर पेशे से जुड़े लोग लड़कियों को बहुत आकर्षित करते हैं। वे दिमागदार, लॉजिकल और स्मार्ट जो होते हैं।
8. लड़कियों की लिस्ट में बिजनसमैन भी शामिल हैं। पैसे की कमी ना होना इसके लिए एक बड़ा कारण है।
वैसे एक अनेकों सर्वे में यह बात निकल कर सामने आई है कि आर्मी अफसर लड़के हमेशा से लड़कियों की पहली पसंद होते हैं चाहे किसी भी देश कि लड़कियां हो. क्यूंकि आर्मी अफसर सबसे ज्यादा स्मार्ट, फिट और अट्रैक्टिव होते हैं और उनका बिहेवियर भी अच्छा होता है.

Thursday, 2 February 2017

जंक फूड के दुष्प्रभाव



Junk Food
जंक फ़ूड का चलन पूरे विश्व में दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। चिप्स,चॉक्लेट्स ,पिज़्ज़ा, बर्गर इत्यादि तले -भुने खाने को जंक फ़ूड की संख्या में गिना जाता है। बच्चें हो या बड़े हो इस जंक फ़ूड का प्रभाव सबपे बढ़ता जा रहा है। परन्तु इस जंक फ़ूड को खाने के सिर्फ नुकसान ही है।
बच्चो पे इसका असर जल्दी पड़ता है । मोटापा इसका सबसे बड़ा नुकसान हैं। लेकिन, हालिया रिसर्च इस जंक फूड की और बड़ी कमी सामने लेकर आया है। यह रिसर्च बताता है कि फास्‍ट फूड न सिर्फ बच्‍चों की शारीरिक सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि इसका असर बच्‍चों के मा‍नसिक विकास पर भी पड़ता है। इस रिसर्च में यह बात सामने आई है कि फास्‍ट फूड का अधिक सेवन बच्‍चों के आईक्‍यू (IQ level)लेवल को कम कर देता है।
Junk Food पहुंचाते हैं दिमाग को क्षति
अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि जंकफूड वास्तव में दिमाग को क्षति पहुंचाते हैं। तले और प्रसंस्कृत खाने के सामानों में पाए जाने वाले रसायन दिमाग को नुकसान पहुंचाने वाले संकेत भेजते हैं जिनसे उसकी भूख को नियंत्रित करने की क्षमता कम होती है।
Junk Food बीमारियों की जड़
इन जंक फ़ूड में कार्बोहायड्रेट की मात्र आदिक होती है जो सभी बिमारियों की जड़ होती है। इसी से कैस्ट्रॉल, हृदयघात ,ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां होती है। हमे अपने जीवन को सही रखने के लिए इसका सेवन काम करना होगा । कभी कभार ऐसे जंक फ़ूड खाने में कोई बुराई नही परन्तु हमे इसका आदि नही होना चहिये। और इसके प्रभाव से बचने के लिए हमे योगा और कसरत करते रहना चाहिए ।

Saturday, 24 September 2016

ख़त्म होती इंसानियत

insaniyat
आधुनिकतावाद के इस दौर में जहाँ आज के इंसान ने रुपियों – पैसो को ही अपना दीन – ईमान बना रखा है, जहाँ ऐशो – आराम के साधनो को अपने लिए ही बनाना आज के भौतिकवादी मनुष्य का ख़ास उद्देश्य बन गया है, इंसानियत कहाँ तक गिर चुकी है, ज़मीर कहाँ तक आज के इंसान का ख़त्म हो चुका है, उसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है ।
कोई सड़क पर दुर्घटना – ग्रस्त होकर तड़प रहा है, बेहोश पड़ा है – उसे संभालने, उसकी मदद इंसान ही कर सकता है, लेकिन आज का इंसान गाडी की रेस बढाकर ऐसे निकल जाता है, जैसे कुछ देखा ही नहीं ।
कितनी गिर चुकी है इंसानियत !
आज का इंसान पैसे के लिए भाई – भाई को, बेटा – बाप को ख़त्म कर रहा है । इंसानी रिश्ते दिन – ब -दिन तार – तार हो रहे हैं । ज़रा सोचिये, वो भाई जो एक ही माँ के पेट से पैदा हुए हों, जिनकी रगों में एक ही खून दौड़ रहा हो, एक ही आँगन में खेलते – खेलते बड़े हुए हों, वो दौलत के चंद टुकड़ों के लिए एक – दूसरे को ख़त्म कर देते हैं ।
क्या इंसानियत इससे भी नीचे गिर सकती है ?
समाज के वो लोग जिन्हें समाज में मुखिया कहा जाता है और जिनमे अभी इंसानियत ज़िंदा है और जो दूसरों के हमेशा काम आते हैं वो लोग आगे चल कर रसातल की ओर जा रहे समाज को रोकें वरना एक दिन ऐसा आएगा कि हर घर में बर्बादी का आलम होगा । लोग नशे के ग़ुलाम हो जायेंगे और खासकर नौजवान पीढ़ी का बुराई से जुड़ने पर जो अराजकता का आलम होगा,उसकी कल्पना भी मुमकिन नहीं । समाज से बुराई को ख़त्म करने के लिए, समाज को साफ़ – सुथरा बनाने के लिए सभी समाज – सेवी बुराई के खिलाफ एक जुट हो कर अभियान चलाएं ताकि ख़त्म हो रही इंसानियत को ज़िंदा रखा जा सके ।.

ज़िन्दगी में रिश्तों का महत्व

rishta
शिशु  जन्म के साथ ही अनेक रिश्तों के बंधन में बंध जाता है और माँ-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी, नाना-नानी जैसे अनेक रिश्तों को जिवंत करता है। रिश्तों के ताने-बाने से ही परिवार का निर्माण होता है। कई परिवार मिलकर समाज बनाते हैं और अनेक समाज सुमधुर रिश्तों की परंपरा को आगे बढाते हुए देश का आगाज करते हैं। सभी रिश्तों का आधार संवेदना होता है, अर्थात सम और वेदना का यानि की सुख-दुख का मिलाजुला रूप जो प्रत्येक मानव को धूप – छाँव की भावनाओं से सराबोर कर देते हैं। रक्त सम्बंधी रिश्ते तो जन्म लेते ही मनुष्य के साथ स्वतः ही जुङ जाते हैं। परन्तु कुछ रिश्ते समय के साथ अपने अस्तित्व का एहसास कराते हैं। दोस्त हो या पङौसी, सहपाठी हो या सहर्कमी तो कहीं गुरू-शिष्य का रिश्ता। रिश्तों की सरिता में सभी भावनाओं और आपसी प्रेम की धारा में बहते हैं। अपनेपन की यही धारा इंसान के जीवन को सबल और यथार्त बनाती है, वरना अकेले इंसान का जीवित रहना भी संभव नही है। सुमधुर रिश्ते ही इंसानियत के रिश्ते का शंखनाद करते हैं।
इंसानी दुनिया में एक दूसरे के साथ जुङाव का एहसास ही रिश्ता है, बस उसका नाम अलग-अलग होता है। समय के साथ एक वृक्ष की तरह रिश्तों को भी संयम, सहिष्णुता तथा आत्मियता रूपी खाद पानी की आवश्यकता होती है। परन्तु आज की आधुनिक शैली में तेज रफ्तार से दौङती जिंदगी में बहुमुल्य रिश्ते कहीं पीछे छुटते जा रहे हैं। Be  PRACTICAL की वकालत करने वाले लोगों के लिए रिश्तों की परिभाषा ही बदल गई है। उनके लिए तो न बाप बङा न भैया सबसे बङा रूपया हो गया है।
किसी भी रिश्ते में धूप-छाँव का होना सहज प्रक्रिया है किन्तु कुछ रिश्ते तो बरसाती मेंढक की तरह होते हैं, वो तभी तक आपसे रिश्ता रखते हैं जबतक उनको आपसे काम है या आपके पास पैसा है।  उनकी डिक्शनरी में भावनाओं और संवेदनाओं जैसा कोई शब्द नही होता। ऐसे रिश्ते मतलब निकल जाने पर इसतरह गायब हो जाते हैं, जैसे गधे के सर से सिंग। परन्तु कुछ लोग अनजाने में ही इस तरह के रिश्तों से इस तरह जुङ जाते हैं कि उसके टूटने पर अवसाद में भी चले जाते हैं। कुछ लोग रिश्तों की अनबन को अपने मन में ऐसे बसा लेते हैं जैसे बहुमुल्य पदार्थ हो। मनोवैज्ञानिक मैथ्यु सेक्सटॉन कहते हैं किः-   इंसानी प्रवृत्ति होती है कि मनुष्य, रिश्तों की खटास और पीढा को  अपने जेहन में रखता है और उसका पोषण करता है। जिसका मनुष्य के स्वास्थ पर बुरा असर पङता है। इस तरह की नकारात्मक यादें तनाव बढाती हैं। तनाव से शरीर में ‘कार्टीसोल’ नामक हार्मोन स्रावित होता है, जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली की क्षमता को कम करता है। परिणाम स्वरूप मनुष्य कई बिमारियों से ग्रसित हो जाता है।  युवावर्ग को खासतौर से ऐसे रिश्तों से परहेज करना चाहिए जो अकेलेपन और स्वार्थ भावनाओं की बुनियाद पर बनते हैं क्योंकि ऐसे रिश्ते दुःख और तनाव के साथ कुंठा को भी जन्म देते हैं।
स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है किः-
“जीवन में ज्यादा रिश्ते होना जरूरी नही है,  पर जो रिश्ते हैं उनमें जीवन होना जरूरी है।”
रिश्तों का जिक्र हो और पति-पत्नी के रिश्तों की बात न हो ये संभव नही है क्योंकि ये रिश्ता तो पूरे परिवार की मधुरता का आधार होता है। इस रिश्ते की मिठास और खटास दोनो का ही असर बच्चों पर पङता है।  कई बार ऐसा होता है कि, छोटी-छोटी नासमझी  रिश्ते को कसैला बना देती है। जबकि पति-पत्नी का रिश्ता एक नाजुक पक्षी की तरह  अति संवेदनशील होता है। जिसे अगर जोर से पकङो तो मर जाता है, धीरे से पकङो अर्थात उपेक्षित करो तो दूर हो जाता है। लेकिन यदि प्यार और विश्वास से पकङो तो उम्रभर साथ रहता है।
कई बार आपसी रिश्ते जरा सी अनबन और झुठे अंहकार की वजह से क्रोध की अग्नी में स्वाह हो जाते हैं। रिश्तों से ज्यादा उम्मीदें और नासमझी से हम में से कुछ लोग अपने रिश्तेदारों से बात करना बंद कर देते हैं। जिससे दूरियां इतनी बढ जाती है कि हमारे अपने हम सबसे इतनी दूर आसमानी सितारों में विलीन हो जाते हैं कि हम चाहकर भी उन्हे धरातल पर नही ला सकते और पछतावे के सिवाय कुछ भी हाँथ नही आता।
किसी ने बहुत सही कहा हैः-  “यदि आपको किसी के साथ उम्रभर रिश्ता निभाना है तो, अपने दिल में एक कब्रिस्तान बना लेना चाहिए। जहाँ सामने वाले की गलतियों को दफनाया जा सके।”
कोई भी रिश्ता आपसी समझदारी और निःस्वार्थ भावना के साथ परस्पर प्रेम से ही कामयाब होता है। यदि रिश्तों में आपसी सौहार्द न मिटने वाले एहसास की तरह होता है तो, छोटी सी जिंदगी भी लंबी हो जाती है। इंसानियत का रिश्ता यदि खुशहाल होगा तो देश में अमन-चैन तथा भाई-चारे की फिजा महकने लगेगी। विश्वास और अपनेपन की मिठास से रिश्तों के महत्व को आज भी जीवित रखा जा सकता है। वरना गलत फहमी और नासमझी से हम लोग, सब रिश्ते एक दिन ये सोचकर खो देंगे कि वो मुझे याद नही करते तो मैं क्यों करूं…………………..
आजकल की व्यस्त जिंदगी में लोगों के पास समय कम है। इसके कारण रिश्तों की गर्मजोशी भी कम होती जा रही है। लोग आजकल अपने आपमें इतने मशगूल रहते हैं कि उन्हें आसपास अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों तक का एहसास नहीं रहता। ऐसे में आपसी रिश्तों में फिर से मजबूती के लिए हम आपको कुछ टिप्स बताते हैं:
एक-दूसरे को समझें
रिश्तों में गर्माहट लाने के लिए जरूरी है कि एक-दूसरे की जरूरतों को समझा जाए। कभी-कभी कुछ कारणों से दोनों में से किसी एक को लगने लगता है कि दूसरा उसे नजरअंदाज कर रहा है। जरूरी है कि ऐसी भावनाओं को पनपने न दें। अगर अपने साथी की इच्छाओं की कद्र करेंगे, तो आपके रिश्ते की डोर और मजबूत होगी।
विश्वास मजबूत करें
किसी भी रिश्ते को विश्वास मजबूत आधार देता है। अगर आपकी अपने साथी से बेहतर बन नहीं रही, तो कहीं न कहीं इसके पीछे विश्वास का कम होना भी है। अपने पार्टनर के प्रति विश्वास पक्का करें। कभी-कभी लगता है कि साथी के स्वभाव में बदलाव हो रहा है, लेकिन यह महज परिस्थितवश भी हो सकता है।
बाधा न बनें
हर आदमी के स्वभाव में भिन्नता होती है। उसकी यह भिन्नता उसे दूसरों से अलग पहचान प्रदान करती है। ऐसे में कभी-कभी कुछ चीजों के नजरिए को लेकर आपस में विरोधाभास की स्थिति बन जाती है। अपने साथी के ऐसे विशिष्ट गुण को पहचानने की कोशिश करें।
समय व्यतीत करें
अपने बिजी शेडय़ूल से कम से कम दिन में एक बार कुछ लम्हे साथ बिताएं। बातें शेयर करें। एक-दूसरे की तकलीफों के भागीदार बनें। उस दिन सारी उलझनों और दिक्कतों को एक तरफ रख दें। महीने में कम से कम एक बार आउटिंग या पिकनिक पर जाएं।
जिम्मेदारी समझें
अकसर हम व्यस्तता के कारण पारिवारिक जिंदगी को प्राथमिकता देना बंद कर देते हैं जो कलह पैदा करती है। अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों पर बराबर ध्यान दें। अपने बच्चों की पढ़ाई व घर की जरूरतों पर निगाह रखें।
“कोई टूटे तो उसे सजाना सिखो,
          कोई रूठे तो उसे मनाना सिखो,
                    रिश्ते तो मिलते हैं मुकद्दर से,
                              बस उसे खूबसूरती से निभाना सिखो।”

Wednesday, 21 September 2016

नशा एक अभिशाप

smoking-kills
नशा एक अभिशाप है । यह एक ऐसी बुराई है, जिससे इंसान का अनमोल जीवन समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है । नशे के लिए समाज में शराब, गांजा, भांग, अफीम, जर्दा, गुटखा, तम्‍बाकु और धूम्रपान (बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, चिलम) सहित चरस, स्मैक, कोकिन, ब्राउन शुगर जैसे घातक मादक दवाओं और पदार्थों का उपयोग किया जा रहा है । इन जहरीले और नशीले पदार्थों के सेवन से व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक हानि पहुंचने के साथ ही इससे सामाजिक वातावरण भी प्रदूषित होता ही है साथ ही स्‍वयं और परिवार की सामाजिक स्थिति को भी भारी नुकसान पहुंचाता है । नशे के आदी व्यक्ति को समाज में हेय की दृष्टि से देखा जाता है । नशे करने वाला व्‍यक्ति परिवार के लिए बोझ स्वरुप हो जाता है, उसकी समाज एवं राष्ट्र के लिया उपादेयता शून्य हो जाती है । वह नशे से अपराध की ओर अग्रसर हो जाता है तथा शांतिपूर्ण समाज के लिए अभिशाप बन जाता है । नशा अब एक अन्तराष्ट्रीय विकराल समस्या बन गयी है । दुर्व्यसन से आज स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्ग और विशेषकर युवा वर्ग बुरी तरह प्रभावित हो रहे है । इस अभिशाप से समय रहते मुक्ति पा लेने में ही मानव समाज की भलाई है । जो इसके चंगुल में फंस गया वह स्वयं तो बर्बाद होता ही है इसके साथ ही साथ उसका परिवार भी बर्बाद हो जाता है । आज कल अक्सर ये देखा जा रहा है कि युवा वर्ग इसकी चपेट में दिनों-दिन आ रहा है वह तरह-तरह के नशे जैसे- तम्बाकू, गुटखा, बीडी, सिगरेट और शराब के चंगुल में फंसती जा रही है । जिसके कारण उनका कैरियर चौपट हो रहा है । दुर्भाग्य है कि आजकल नौजवान शराब और धूम्रपान को फैशन और शौक के चक्कर में अपना लेते हैं । इन सभी मादक प्रदार्थों के सेवन का प्रचलन किसी भी स्थिति में किसी भी सभ्य समाज के लिए वर्जनीय होना चाहिए ।
Nasha Mukti
जैसा कि हम सभी जानते हैं धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है । इससे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी होती है और यह चेतावनी सभी तम्बाकू उत्पादों पर अनिवार्य रूप से लिखी होती है, और लगभग सभी को यह पता भी है । परन्तु लोग फिर भी इसका सेवन बड़े ही चाव से करते हैं । यह मनुष्य की दुर्बलता ही है कि वह उसके सेवन का आरंभ धीरे-धीरे करता है पर कुछ ही दिनों में इसका आदी हो जाता है, एक बार आदी हो जाने के बाद हम उसका सेवन करें, न करें; तलब ही सब कुछ कराती है ।
समाज में पनप रहे विभिन्न प्रकार के अपराधों का एक कारण नशा भी है । नशे की प्रवृत्ति में वृध्दि के साथ-साथ अपराधियों की संख्या में भी वृध्दि हो रही है । नशा किसी भी प्रकार का हो उससे शरीर को भारी नुकसान होता है, पर आजकल के नवयुवक शराब और धूम्रपान को फैशन और शौक के लिए उपयोग में ला रहे हैं । यहां तक की दूसरे व्यक्तियों द्वारा ध्रूमपान करने से भी सामने वाले व्यक्ति के फेफड़ों में कैंसर और अन्य रोग हो सकते हैं । इसलिए न खुद धूम्रपान करें और न ही किसी को करने दें । कोकीन, चरस, अफीम ऐसे उत्तेजना लाने वाले पदार्थ है जिसके प्रभाव में व्यक्ति अपराध कर बैठता है । इनके सेवन से व्यक्ति पागल तथा सुप्तावस्था में हो जाता है । इसी तरह तंबाखू के सेवन से तपेदिक, निमोनिया और सांस की बीमारियों सहित मुख फेफडे और गुर्दे में कैंसर होने की संभावनाएं रहती हैं । इससे चक्रीय हृदय रोग और उच्च रक्तचाप की शिकायत भी रहती है ।
डॉक्टरों का कहना है कि शराब के सेवन से पेट और लीवर खराब होते हैं । इससे मुख में छाले पड़ सकते हैं और पेट का कैंसर हो सकता है । पेट की सतही नलियों और रेशों पर इसका असर होता है, यह पेट की अंतड़ियों को नुकसान पहुंचाती है । इससे अल्सर भी होता है, जिससे गले और पेट को जोड़ने वाली नली में सूजन आ जाती है और बाद में कैंसर भी हो सकता है । इसी तरह गांजा और भांग जैसे पदार्थ इंसान के दिमाग पर बुरा असर डालते हैं । इन सभी मादक द्रव्यों से मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचने के साथ-साथ समाज, परिवार और देश को भी गंभीर हानि सहन करनी पड़ती है । किसी भी देश का विकास उसके नागरिकों के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है, लेकिन नशे की बुराई के कारण यदि मानव स्वास्थ्य खराब होगा तो देश का भी विकास नहीं हो सकता । नशा एक ऐसी बुरी आदत है जो व्यक्ति को तन-मन-धन से खोखला कर देता है । इससे व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जाती है । इस बुराई को समाप्त करने के लिए शासन के साथ ही समाज के हर तबके को आगे आना होगा । यह चिंतनीय है कि जबसे बाजार में गुटका पाउच का प्रचलन हुआ है, तबसे नशे की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है । आज बच्चे से लेकर बुजुर्ग भी गुटका पाउच के चपेट में है ।
————————-: जरा इस ओर ध्‍यान देवें :————————-
     :- शराब पीने वाले व्यक्ति का 50/- रु. रोज का खर्च मानकर चलें, तो एक महीने का 1,500/- रु. व सालभर में 18,000/- रु. होते हैं । एक व्यक्ति अपने जीवन भर में 50 वर्ष शराब का सेवन करता है तो 9,00,000/- रु. (नौ लाख) फिजूल खर्च कर देता है ।
:- सिर्फ एक साल की बचत 18000/- रु. पोस्ट ऑफिस में फिक्स (किसान विकास-पत्र) जमा कराने से 42 वर्ष, 11 महीने तक रिन्यू कराते रहने पर यह रकम 5,76,000/- रु जमा हो जाती है । जो आपकी जिन्दगी के लिए पेन्शन या बच्चों की शिक्षा के काम आ सकती है ।
:- बीड़ी पीने वाले व्यक्ति का बीड़ी व माचिस का कम से कम रोजाना का खर्च 10/- रु माने, तो एक महिने में 300/- रु सालभर में 3,600/- रु होते है । 50 वर्ष का हिसाब लगावें तो 1,80,000/- रु फिजूल खर्च में राख हो जाते है तथा कैंसर को न्योता! देते है ।
:- गुजरात में तम्बाकू व गूटखे के सेवन से 32 हजार व्यक्ति हर वर्ष मरते है, कारण है, कैंसर ।
:- अकेले भारत में एक दिन में 11 करोड़ की सिगरेट पी जाते है । इस तरह एक वर्ष में 50 अरब रु का धुंआ हो जाता है तथा कैंसर को निमंत्रण !
ये कैसी विडम्बना है कि सामाजिक हितो से सम्बन्धित तमाम मुद्दो व उससे जुड़े नकारात्मक प्रभावो पर हमारी सरकारे व सामाजिक सँगठन बहुत जोर शोर से आवाज उठाते हुए कुछ मसलो पर आन्दोलन तक छेड़ देते है परन्तु आये दिन इस तरह की होने वाली घटनाओ पर कभी भी कोई सामाजिक संगठन या राजनीतिक दल न आवाज उठाते है और न ही इस गम्भीर समस्या के निदान की ब्रहद स्तर पर कोई पहल करते है । कुछ जागरुक व जिम्मेवार नागरिक स्थानीय स्तर पर कही कही कुछ थोड़े प्रयास जरुर करते रहते है लेकिन वे इस बुराई को जड़ से मिटाने मे कभी भी पूर्ण समर्थ नही हो पाते ।
सबसे पहले हमे शराब से होने वाले सामाजिक दुःष्प्रभाव व उससे होने वाले धन जन की हानि के विषय मे विचार करना चाहिए । शराब का सेवन विभिन्न प्रकार से समाज के विभिन्न प्रकार के लोगों द्वारा किया जाता रहा है कुछ लोगों के लिए शराब का सेवन अपनी सोसाइटी मे दिखावे के लिए किया जाता है ऐसे लोग अच्छे ब्राण्ड की शराब का सेवन करते है तथा दिन मे किसी एक समय या फिर कभी कभी कुछ अवसरों पर करते है । आर्थिक रुप से सुद्रढ़ ये वर्ग सिर्फ मौज मस्ती के लिए ऐसा करते है । मध्यमवर्गीय व निम्नवर्गीय लोगों के लिए मधपान करने के अनेको कारण होते है, जिनके विषय मे प्रायः हम सभी जानते है कुछ लोग शौकिया पीने लगते है तो कुछ लोग संगत के असर से । कुछ लोग सीमित व सँतुलित रहते हुए समाज मे अपनी इस आदत को छिपाये रखते है तो कुछ लोग अतिरेकता मे बहकते हुए स्वच्छन्द हो जाते है ऐसे लोग एक बार जब सामाजिक मर्यादा की सीमाओ का उल्लघन कर देते है तो फिर वे समाज की मुख्यधारा से कटते चले जाते है ।
शौकिया तौर पर लती हुए लोग जब आर्थिक रूप से कमजोर हो जाते है तो स्थिति भयावह रुप ले लेती है खुद का रोजगार तो प्रभावित होता ही है प्राइवेट फाइनेन्सरो के जाल मे फँस कर कर्जदार तक हो जाते है और तब उनका ये शराब रुपी नशे का “रोग ” गम, उलझन व परेशानी से मुक्ति पाने की “दवा” भी बन जाता है । इस अवस्था मे ऐसे लोग गहरे अँधियारे मे धँसते चले जाते है । उन्हे शराब मे ही हर समस्या का समाधान दिखायी देता है । ऐसे मुश्किल क्षणो मे जब कोई करीबी उन्हे समझाने बुझाने व सुधारने के अतिरिक्त प्रयास करता है तो अक्सर उन्नाव जैसी घटना हो जाती है ।
ऐसे लोगो पर समाज का दखल व असर नही होता क्योकि अक्सर लोगो के समझाने पर ये लोग सिर्फ एक ही जुमले का प्रयोग करते है ,” तुम्हारे बाप का पीते है क्या ” और तब हर स्वाभिमानी व्‍यक्ति ऐसे लोगो से दूर रहने मे ही अपनी भलाई समझता है । इन परिस्थितयो मे भुक्तभोगी परिवार पूरे समाज से अलग थलग पड़ जाता है कोई उनका दुःख सुनने वाला नही होता । निकट रिश्तेदार आखिर कितने दिनो तक करीब रहते हुए उनकी मदद कर सकते है ।
सबसे खराब स्थिति उन बच्चो की होती है जो बालिग नही होते, माँ बाप की रोज की किच किच का उनके अर्न्तमन मे बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है ,ऐसे बच्चे मानसिक रुप से अन्य बच्चो की अपेक्षा पिछड़ जाते है घर का अच्छा माहौल न मिलने से उनमे दब्बूपन आ जाता है और वे हमेशा डरे डरे से रहते है अपने सहपाठियो से खुलकर बात नही कर पाते शिक्षक के समक्ष अपरोधबोध से ग्रसित व सहमे सहमे रहते है एक अँजान डर के कारण पढ़ा लिखा कुछ भी पल्ले नही पड़ता, हम हमारा समाज व सरकारे क्या कभी ऐसे लोगो के दुःख दर्द व मानवाधिकार से सम्बन्धित विषयो पर गौर करता है या फिर गौर करेगा ?
मेरा तो शाशन और प्रशाशन से ये अनुरोध है कि आखिर हम पूर्ण शराब बँदी क्यो नही लागू करते, जिस वस्तु से हमारा समाज दिन प्रतिदिन विषैला होता जा रहा हो उसका क्यो न हम पूर्ण तिलाँजलि कर दे कुछ गरीब परिवारो की जड़ो को खोखला करके हम अमीरो को और अमीर करके क्या हासिल करना चाहते है । अमीर व सँम्पन्न लोग ऐसा नशा खुद की कमाई से न करके इधर उधर के पैसो से करते है जब कि आम आदमी अपने खून पसीने के पैसो व उसके पश्चात जर जमीन बेँच कर नशा करते है और जब वह भी नही होता तो आम नागरिको के यहाँ लूटपाट करके समाज मे और विषम स्थिति पैदा करते रहते है ।
किसी भी तरह के नशे से मुक्ति के लिए सिर्फ एक ही उपाय है वह है संयम वैसे तो संयम कई समस्याओं का समाधान है लेकिन जहां तक नशामुक्ति का सवाल है संयम से बेहतर और कोई दूसरा विकल्प नहीं है हाँ सेल्फ मोटिवेशन भी नशामुक्ति में बेहद कारगर है या फिर किसी को मोटिवेट करके या किसी के द्वारा मोटिवेट होके भी नशे से मुक्त हुआ जा सकता है लेकिन यदि तम्बाकू का नशा करने वाला यदि संयम अपनाए तो इस पर जीत हासिल कर सकता है जब कभी तम्बाकू का सेवन करने की तीव्र इच्छा हो तो संयम के साथ अपना ध्यान किसी अन्य काम में लगा लें ज़्यादातर तम्बाकू को भुलाने की कोशिश करें वास्तव में यदि व्यक्ति हितों के प्रति जागरुक हैं तो वह किसी भी नशे की चपेट में आ ही नहीं सकता और यदि आ भी जाए तो थोडा सा संयम और सेल्फ मोटिवेशन उसे इस धीमे ज़हर से मुक्त कर सकता है । तम्बाकू और इसके घातक परिणामो से हम अपने करीबी और अपने मित्रों को परिचित करायें यदि कोई आपका करीबी तम्बाकू या किसी नशे की लत का शिकार है तो उसे मोटिवेट करके उसे संयम का रास्ता बताएं और नशे से मुक्त होने में उसकी मदद करें ।
व्यसनों से मुक्ति पाने के लिए नशे करने वाले साथियों से अधिक से अधिक दूर रहें ।, मेहमानों का स्वागत नशे से न करें । घर में या जेब में बीड़ी-सिगरेट न रखें ।, बच्चों के हाथ बाजार से नशीली वस्तुएं न मंगवाएं, स्वयं को किसी न किसी रचनात्मक कार्य में व्यस्त रखें ।, इसके अपने दोस्तों और पारिवारिक डॉक्टर की भी मदद लें ।, नशे से जुड़ी चीजों को दूर रखें । सबसे खास़ बात इस धीमे जहर के सेवन न करने के प्रति खुद को मोटिवेट करें ।
नशा नाश की जड़ है । नशा हर बुराई की जड़ है । इससे बचकर रहने में ही भलाई है । इन पदार्थों से छुटकारा दिलाने के लिए पीड़ित व्यक्तियों का उपचार आवश्यक है । इस दिशा में शासन के द्वारा जिला स्‍तर पर नशामुक्ति केंद्र स्थापित किए गए हैं । इन केंद्रों में मादक द्रव्य अथवा मादक पदार्थों का सेवन करने वाले व्यक्तियों को छुटकारा दिलाने के लिए नि:शुल्क परामर्श सहित उपचार किए जाते हैं । राज्य सरकार द्वारा विभिन्न सूचना तंत्रों के माध्यम से नशापान के विरूध्द लोगों में जनजागरूकता लाई जा रही है । राज्य के विभिन्न महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थानों में नशा करने से होने वाले हानि को प्रदर्शित करते हुए होर्डिंग्स लगाए गए हैं । नशे के दुष्प्रभावों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए प्रदेश में जनसहभागिता से रैली, प्रदर्शनी, प्रतियोगिताओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और परिचर्चा आदि के आयोजन के साथ ही नशे के दुष्परिणामों को दर्शाने वाली पाम्पलेट, ब्रोसर आदि वितरित किए जा रहे हैं । नशामुक्ति के लिए 30 जनवरी को नशामुक्ति संकल्प और शपथ दिवस के रूप में मनाया जाता है । इसी प्रकार 31 मई अंतर्राष्ट्रीय धूम्रपान निषेध दिवस, 26 जून को ‘अन्तर्राष्ट्रीय नशा निवारण दिवस’, 2 से 8 अक्टूबर तक मद्यनिषेध सप्ताह और 18 दिसम्बर को मद्य निषेध दिवस के रूप में मनाया जाता है । पर नशे को जड़ से मिटाने के लिए हमें हर दिवस को नशामुक्ति दिवस के रूप में मनाना चाहिए ।
एक पूर्ण नशामुक्त व्यक्ति अपने परिवार, समाज एवं राष्ट्र की सर्वाधिक सेवा कर सकता है और राष्ट्र तथा समाज के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है । अंत में नशा करने वालों से मेरी ये गुजारिश है कि अपने को छोड़कर एक अपने परिवार, माता, पिता, पत्नी और बच्चों का ख्याल रखते हुए ये सोचना होगा कि कल अगर आपको कुछ हो जाता है तो उनको कितना कष्ट होगा जो पूरी तरह आप पर ही आश्रित हैं । अगर आपको उनसे वास्तव में प्यार हैं । तो आपके परिवार वालों को ये न सुनना पड़े कि आप तो कुछ दिन के ही मेहमान हैं । आपका इलाज संभव नहीं है । आपके परिवार वाले डॉक्टर से पूछते हैं कि क्या ऑपरेशन से भी ठीक नहीं होगा ? तो डॉक्टर का जवाब आता है कि कहाँ-कहाँ ऑपरेशन करेंगे पूरा शरीर खोखला हो गया है । आइये प्रण करें कि जहाँ तक संभव होगा लोगों को नशे के सेवन करने से रोकेंगे । केवल और केवल व्‍यसन मुक्‍त व्‍यक्ति ही अच्‍छे समाज की रचना कर सकता है ।
धर्म विचारों सज्जनों बनो धर्म के दास ।
सच्चे मन से सभी जन त्यागो मदिरा मांस ।।